[रिपोर्ट: राधेश बुद्धभट्टी] खाटूश्याम बाबा का संबंध महाभारत काल से है। ऐसा कहा जाता है कि खाटू श्याम पांडव पुत्र भीम के पोते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर तथा खाटू श्याम के शीश दान से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया था कि कलियुग में वह बाबा श्याम के नाम से पूजे जायेंगे और प्रसिद्ध होंगे। शपथ लेने के बाद उनका सिर राजस्थान के सीकर नामक कस्बे में रखा गया। इसीलिए इसे खाटू श्यामा बाबा कहा जाता है।
अपने वनवास के दौरान, जब पांडव अपनी जान बचाने के लिए जंगल में भटक रहे थे, तब भीम की मुलाकात हिडम्बा से हुई और हिडम्बा ने उनसे विवाह कर लिया। परिणामस्वरूप, उनका एक पुत्र हुआ, घटोत, जिसकी निर्मम हत्या कर दी गई। पिता और पुत्र दोनों ही भीम की तरह अपने बल और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध हुए। जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध हुआ तो बर्बरीक ने युद्ध देखने का निर्णय लिया। जब भगवान कृष्ण ने उनसे पूछा कि युद्ध में वह किसकी ओर हैं, तो उन्होंने कहा कि हारने वाला पक्ष उनकी ओर से लड़ेगा। इसीलिए इसे आज भी हारे हुए लोगों का सहारा कहा जाता है।
भगवान कृष्ण युद्ध का परिणाम जानते थे और उन्हें डर था कि इसका परिणाम पांडवों के लिए बुरा होगा। ऐसी स्थिति में भगवान कृष्ण ने बर्बरीक को रोकने के लिए दान मांगा। दान में उसने उससे उसका सिर मांग लिया। दानस्वरूप बर्बरीक ने उसे अपना सिर दे दिया, किन्तु अंत में उसने युद्ध देखने की इच्छा व्यक्त की।
उनकी इच्छा पूरी करते हुए श्री कृष्ण ने उनका सिर युद्ध स्थल पर एक पहाड़ी पर रख दिया। युद्ध के बाद पांडवों में इस बात पर झगड़ा होने लगा कि युद्ध जीतने का श्रेय किसे मिलना चाहिए। तब बर्बरीक ने कहा कि भगवान कृष्ण के कारण ही उन्हें विजय प्राप्त हुई है। भगवान कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न हुए और उन्हें कलियुग में श्याम नाम से पूजित होने का वरदान दिया।
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